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कोई भी ऐश्वर्य / योगेंद्र कृष्णा

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कोई भी ऐश्वर्य
कितना भी मोहक
पथभ्रष्टकारी क्यों न हो
आदमी से बड़ा नहीं

पहाड़ की ऊंचाई से झरते
उस शीतल फुहार से भी बड़ा नहीं
जो एक चमत्कार की तरह
सौंपती हो हमें हमारा खोया सुकून

कितना भी बड़ा सौभाग्य
उस पेड़ जितना बड़ा नहीं
जो फलों से लद जाने पर
हमारे लिए झुक जाता हो

उस बांझ स्त्री जितना
बड़ा नहीं कोई ऐश्वर्य
जो हमसे छुपकर मंदिर मस्जिद
और मज़ारों पर हमारे लिए
संतान की सच्ची दुआएं मांगती हो
 
कोई भी सौभाग्य
मां की उस दृष्टि से बड़ा नहीं
जो गृहस्थ जीवन के
सारे कोलाहलों के बीच से
निकाल कर थोड़ी-सी जगह
सो रहे बच्चे को हर बार
दबे पांव निहार जाती हो
 
क्यों चाहिए मुझे
आसमान की ऊंचाई
स्वयं आसमान जब
मेरे ज़हन में बार-बार उतरता हो

जिसका बूंद-बूंद पानी
धरती को ही तरसता हो...

क्यों चाहिए मुझे
पहाड़ की चोटियां
जबकि साबुत पहाड़
स्वयं हमारी नदी की सतह पर
दोपहर की रौशनी में
कांपता-लरजता हो

क्यों चाहिए मुझे सीढियां
जो दुनियाबी रिश्तों के
अनाम समझौतों दांव-पेंच
और जद्दोजहद के बीच
बनती बिगड़ती...
टूटती बिखरती हैं
 
क्यों चाहिए मुझे इंतज़ार
किसी चमत्कार का
जो मेरा सौभाग्य रच सके

फ़ॉस्टस की आत्मा की तरह
क्यों किसी शैतान के यहां
गिरवी हो हमारी आत्मा
या क्यों ईकारस जितनी
महत्वाकांक्षी और आत्मघाती हो
मामूली कल्पना की मेरी उड़ान...

मुझे मेरी ज़मीन पर
कुछ ऐसे घटित होने दो
कि स्थगित हो जाएं
दुनिया की सारी बेतुकी उड़ानें
और सारी बदहवास ऊंचाइयां
मेरे पड़ोस में सरज़मीं हो जाएं...