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दिया तले अंधेरा है / हरेराम बाजपेयी 'आश'

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कैसी यह जागृति है, कैसा यह सबेरा है,
कैसी यह दिवाली कि दिया तले अँधेरा है।

खेतों को दे खून पसीना, अधिक अन्न उपजाते है,
दुनिया का पेट भरें पर, खुद भूखे रेह जाते है,
धरती माँ के कर्मठ बेटे, आँसू पीकर जीते है,
घर वाले ही लूट रहे है, किसको कहे लुटेरा है...
 दिया तले अँधेरा है...॥

तन ढँकने की उम्मीदों में, कफन नाडीन जुट पाता है,
मेहनत और अभावों से जनम-जनम का नाता है,
कर्जों की दुनिया में जन्में, कर्ज बोझ से मर जाएँ,
सब जुच होते हुए उसी का, कैसे कहे कि मेरा है...
 दिया तले अँधेरा है।

जिसके बल पर खड़े महल है और खड़ी है कोठियाँ,
वही झोपड़ी में सोता है, खा कर रूखी रोटियाँ,
दुनिया को देता प्रकाश पर, स्वयं अँधेरा पाता है,
कृषकों के जीवन में अब भी, गहरा घना अँधेरा है,
 दिया तले अँधेरा है।

हरित क्रान्ति का सपना पूरा नहीं रैलियों से होगा,
भारत-मां के वीर सपूतों, स्वयं तुम्हें लड़ना होगा,
'जय किसान' की ज्योति जलाकर, शास्त्री तुम्हें पुकार रहा,
अंधियारी रातों के पीछे, होता नया सबेरा है।
 दिया तले अँधेरा है...॥