भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

देसूंटो-3 / नीरज दइया

Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:19, 27 जून 2017 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जद-जद आभो आवै
म्हारी आंख मांय
पकड़ आंगळी उण री
आवै म्हारा बारै सुपना

बो लावै सुपना
का म्हारै मांयला सुपना ई
म्हनै सूंप जावै

म्हनै ठाह ई’ज नीं
मांय म्हारै दपट्योड़ा
कठै-कठै है-
म्हारा सुपना

म्हैं जाणूं
म्हारै मांय है-
अंधारो ही अंधारो
ठाह नीं आवैला कद-
आंधी
अर भूलैला मारग-
म्हारी सांस

म्हैं नीं जाणूं
मांय म्हारै
कठै-कठै पूगै
आभो

कोई दूजो नीं काढै
म्हरो आभो ई काढै
आपै रै घर-अगाड़ी
हमेस कर

बेमाता रे लेखै
फगत आभो म्हारो
हां ऽ, हां म्हारो आभौ ई’ज
उळाधै आपरी कार

कांईं आभै नैं
कोई नीं रोक सकै
इतरो मोटो आभो
आभै नैं कुण टोक सकै

आभै मांय है-
अगन, पवन अर पाणी

किणी चोर दांईं
उतरै होळै-सी
आखो आभो
मांया म्हारै
अर पसर जावै
म्हारी धरती माथै
उण रो आखो अंधारो
अणनाप अंधारो

म्हारै आभै मांय
थूं बसै सांवरा
थूं ई’ज करै
सगळा खेल सांवरा

सांस रा धणी !
थूं रचै सुपनां

घड़ी री टिक्
अर थूं रचै सुपनो
थूं रचै सुपनो
अर घड़ी री टिक्

थूं इ’ज रचिया-
सगळा रा सगळा
सुपना म्हारा

सुपनां रै देस
थूं पलटै घड़ी-घड़ी खेल
म्हारी सांस-सांस सूं
थूं खेलै खेल

थारै पाखती
सगळी घड़्यां
सगळा सुपना म्हारा

म्हारै पाखती
फगत है-
अेक छिब थारी

थूं बगत मांय नीं म्हारै
बगत सूं बारै है
नित-नेम सूं बंध्योड़ी है-
सांस री धुक्-धुकी
अर घड़ी री टिक्-टिकी
इण री ठाह हुवै
अर ठाह नीं हुवै

बंध्योड़ी है-
आ देसी म्हारी
सांस-डोर सूं

आ अेक जातरा है
इण री ठाह हुवै
पण ठाह नीं हुवै

सांवरा !
नितूका तूटता जावै
म्हारी काया रा काचा धागा
अर अेक दिन
तूट जावैला सगळा
सगळा रा सगळा
छूट जावैला सगळा
सगळा रा सगळा

पक्को है पूगणो
थारै पाखती
थूं नित खींचै-
म्हारी सांस-डोर !

घड़ी री टिक्-टिकी
अर सांस री धुक्-धुकी
हुवैला मांय म्हारै
अेक दिन अेक धमाको

पण अजेस
कविता रा पाठकां !
धीजो सावळ काठो राखजो
सुपना कदैई नीं मरैला
अबार सांस मे सुपना है
फेर सुपनां में हुवैला सांस

फगत बदळैला बगत
ओ आभो उतरैला
भळै किणी दूजी आंख
सागळा सुपना पाछा
उगटैला किणी दूजै भेख

आभै मांय है-
अजेस केई तूटता तारा
अर दीसै म्हनै
केई-केई सुपना म्हारा

फगत आभै रो धणियाप नीं
कर्यो ऊभो म्हनै
म्हारी आ धरती

म्हारी जड़ां
घणी-घणी ऊंडी है
म्हारी धरती मांय

ओ सांच है-
कै नीं हुवै
कोई मिनख
कदैई जड़ बायरो
अर मिनख री जड़ां सूं-
अणजाण नीं हुया करै
आभो !

आभो: पोखै !
आभो: रोसै !!

आभै नै देखतो-देखतो ई’ज
ऊभो हुया करै मिनख
आभै रै पाण ईज
बसिया है-
केई-केई मिनख
केई-केई देस

करै उलट-पलट
ओ आभो
जिण री
आंख री सैन
समझ चालै
अंधारो अर आंधी
 
ओ सांच है-
कै केई वळा
बगत सूं पैली ई’ज
टाळवै मिनखां नैं
टाळ लेवै आभो