भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

द्रौपदी की इज्जत / प्रेम कुमार "सागर"

Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 13:56, 20 जुलाई 2012 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


प्यासी अवाम है औ' सड़कों पर पानी है
मेरे शहर की यारों यहीं कहानी है |

बच्चों की भूख, माँ की सुखी हुई छाती
कुत्तों की थाल में बिस्कुट ब्रितानी है |

खुला है आसमाँ लेकिन परिंदा उड़ नहीं सकता
यहाँ पर को कतरने की रीति सदियों पुरानी है|

खुद को जल जाने से, कहो, कैसे बचाओगे
कहीं कातिल निगाहें हैं कहीं तपती जवानी है |

बनो तुम कृष्ण लेकर हाथ में चक्र-ऐ-सुदर्शन को
द्रौपदी की इज्जत कौरवों से फिर बचानी है |

तू मत झगड़ मझधार में मौजों से इस तरह
टूटी-फूटी सी किश्ती है औ' लहरें तूफानी है |


'सागर' किसी की तू जरुरत बन नहीं सकता
मीठी है प्यास लोगों की औ' खारा तू पानी है |