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पाँच बाल कविताएँ / श्याम सुन्दर अग्रवाल

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1-वर्षा आई
काले-काले बादल आए,
छाई घटा घनघोर।
चमक-चमक के बिजली गरजी,
खूब मचाया शोर।

लगी चहकने चिड़िया रानी,
नाची खूब गिलहरी।
बच्चों ने इतना शोर मचाया,
दादी हो गई बहरी।


2-हाथी की कार

हाथी जी ने फोन मिलाया,
कार बनाने वालों के।
जल्दी ऐसी कार बना दो,
बिठा सकूँ घरवालों को।

थोड़ा-सा पैट्रोल वह खाए,
हो खूब तेज रफ्तार।
सुंदर हो, मजबूत भी हो,
पर सस्ती-सी हो कार।



3-पढ़ना है जी, पढ़ना है

भारी बस्ता उठाके रस्ता,
कैसे भी तय करना है।
पढ़ना है जी पढ़ना है
पढ़-लिख आगे बढ़ना है।

माँ-बापू को मिलें सभी सुख,
भूखे अब नहीं मरना है।
लड़ना अपने हक की खातिर,
नहीं किसी से डरना है।

नया ज्ञान पा कर के हमको,
हर दुश्मन से लड़ना है।
पढ़ना है जी पढ़ना है,
पढ़-लिख आगे बढ़ना है।


4-पुकार

सुबह-सवेरे उठना पड़ता,
फिर रहती है भागमभाग।
थके हुए स्कूल से लौटें,
तब चले ‘होमवर्क’ का राग।
जितना दिन भर पढ़ें स्कूल में,
उससे ज्यादा होमवर्क।
बच्चे कितने दुखी हैं होते,
इससे टीचर को नहीं फर्क।
बच्चे हैं हम, थक जाते हैं,
उठा के भारी बस्ता।
टीचर जी के डंडे का डर,
कर देता हालत खस्ता।
सोम-मंगल तो ठीक से बीतें,
बुध, वीर परेशानी।
शुक्र, शनि की बात न पूछो,
याद आती है नानी।
करनी होती दूर थकावट,
छ: दिन न तड़पाया करो।
‘रविवार’ बच्चों के प्यारे,
दो-तीन दिन में आया करो।



5-राजा दुम दबाकर भागा

रोक कार को बोला शेर,
खोलो खिड़की करो न देर।
जंगल का मैं राजा हूँ,
कहते मुझको बब्बर शेर।

‘जंगल-दिवस’ आज हमारा,
करनी मुझको लंबी सैर।
अगर नहीं करवाओगे तो,
बच्चू नहीं तुम्हारी खैर।

रिंग-मास्टर सर्कस का हूँ,
नाम है मेरा ‘सागा’ ।
कहा कार वाले ने तो,
राजा दुम दबाकर भागा।