भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

बादल आना मेरे गाँव / राम करन

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता ५ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 00:10, 27 फ़रवरी 2021 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=राम करन |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKavita}} <po...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बरगद बाबा खड़े मिलेंगे,
जटा-जूट से बढ़े मिलेंगे।
झुककर छूना उनके पांव,
बादल! आना मेरे गाँव।

पके रसीले आम मिलेंगे,
लँगड़ा, बुढ़वा नाम मिलेंगे।
और मिलेगी पीपल छाँव,
बादल! आना मेरे गाँव।

घर-घर ठाड़े नीम मिलेंगे,
दातुन लिये हक़ीम मिलेंगे।
चिड़ियां करती 'ची-ची-चांव',
बादल! आना मेरे गाँव।

छम-छम-छम-छम बूंद गिरेंगे,
छप-छप-छप पतवार करेंगे।
तैराएँगे हम सब नाव,
बादल!आना मेरे गाँव।

हरे खेत में धान रहेंगे,
बहुत प्रेम-सम्मान करेंगे।
रुकना थोड़ा सबके ठाँव,
बादल! आना मेरे गाँव।