भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

मालवा में अकाल / महेन्द्र भटनागर

Kavita Kosh से
Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:44, 20 अगस्त 2008 का अवतरण (New page: ::{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=महेन्द्र भटनागर |संग्रह= बदलता युग / महेन्द्र भटनागर }}...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


अकाल-ग्रस्त मालवा !
हताश जन,
निराश जन
भूख, भूख, भूख !
नष्ट हो गयी फ़सल,
दर असल ?

दूर-दूर से,
उदास
छोड़ गाँव आ रहे
कुटुम्ब-के-कुटुम्ब,
और यह अवन्तिका नगर
कि कालिदास की प्रसिद्ध
कर्म-भूमि
घिर गयी अकाल से !

दैत्य भूख का खड़ा हुआ अकड़,
खोल सर्व-भक्ष्य-मुख !

पर,
अकाल है ग़रीब के लिए,
दर्द, भूख, त्रास, दुःख हैं
ग़रीब के लिए !
मिट रहा अशक्त सिर्फ़ वर्ग यह !

सेठ के मकान में भरा अनाज है,
ज़मीनदार के मकान में भरा अनाज है,
कौन जीव एक जो उदास ?
घूमते अबंध मूर्ख से कठोर,
लाल-लाल दाँत
पान से रँगे बता रहे
समूह-के-समूह का
निकाल रक्त पी चुके !
सफ़ेद वस्त्र
सूक्ष्म तार-तार से बना पहन
एक क्या अनेक कह रहेµ
‘कि मिल रहा न ज्वार-बाजरा।’
गेहुँ से भरी हुई
अजीब तोंद ले !

(विषम प्रयास स्वाभिमान का)
उठो किसान औ’ मजूर
एकता तुम्हें बुला रही,
अकाल ग्रस्त-त्रस्त
जब समस्त मालवा !