भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

लगनवाँ बीतल जाय / मनोज कुमार ‘राही’

Kavita Kosh से
Rahul Shivay (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 01:02, 21 जुलाई 2018 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

लगनवाँ बीतल जाय,
मोरा अइलै न लगनवाँ
सोलह बरसिया बीतल,
धड़के ला परनवाँ
लगनवाँ

गाँव के सब सखिया मोरी,
चम्पा, परबतिया, गौरी
चलली अपनोॅ पिया के नगरी,
सोलह श्रृंगार करी पहनी केॅ गहनवाँ
लगनवाँ बीतल जाय

बाबा भोले के पूजा कइलौं
फूल आरो बतासा चढ़ैइलौं,
एकरोॅ सें न बनल बतिया
फूटल मोर करमवाँ
लगनवाँ बीतल

दौड़ीदौड़ी गंगातट गइलीं,
गंगा मैया से अरजिया करलीं,
चम्पा आरो परबतिया अहसन,
हमरोॅ दीहोॅ सुन्दर साजन
लगनवाँ बीतल

लोर ढरकावै आँखिया,
राती न आवै नींदिया,
केकरा सें कहूँ दुःखवा,
छुटल सब सखीसहेलिया
लगनवाँ बीतल