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विश्व हिन्दी सम्मेलन / महेश चंद्र द्विवेदी

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उस वर्ष लंदन में
विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित था ।
कुछ लेखन से, कुछ तिकड़म से
मैं भी आमंत्रित था।

समापन के दिन तक रोज़, कुछ तुक के,
कुछ बेतुके भाषण सुनकर मैं थक चुका था ।
वक्ताओं का भाषणबाज़ी का राष्ट्रीय शौक,
लन्दन पहुँचकर द्विगुणित हो चुका था ।

समाप्ति पर लम्बी जम्भाई लेता हुआ मैं
बाहर निकला, चाह थी एकान्त की,
अतः चल दिया टेम्स नदी की ओर
जहाँ घटाटोप बादलों से घिरी शाम थी ।

लन्दन ब्रिज से उतरकर टेम्स के किनारे बने
पैदल पथ पर एक खाली बेन्च पर बैठ गया ।
निर्जनता के सम्मोहन ने मन मोह लिया,
लहरों का कलकल स्वर ह्रदय में पैठ गया ।

तभी बाईं ओर बेंच पर अकस्मात
किसी अजनबी की उपस्थिति का भान हुआ ।
अचानक वहाँ एक बूढ़े अँग्रेज़ को देखकर
मन में भय उपजा, शान्ति का अवसान हुआ ।

'हलो! कैसा रहा वर्ल्ड हिन्डी कांफ़्रेन्स ?"
मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह पूछ बैठा ।

मैं अचकचाया, पर सहज होकर बोला, "ठीक ही था,
मुख्यतः हिन्दी की दुर्दशा पर मातम था ।"

बूढ़ा ठहाका लगाकर हँसा, फिर बोला,
"मैं जानटा था और कुछ हो ही नहीं सकटा",
असीम जिज्ञासा से भरकर मैने पूछा,
"परन्तु सर! आप कैसे जानते थे?"

बूढ़ा गूढ़ मुस्कराहट के साथ बोला,
"तुम हिन्डुस्टानी लोग!
हिस्ट्री को न तो ठीक से पढ़ता है
और न उससे कुछ सीखता है ।

तुम समझटा है कि
आज़ाडी पाकर तुम गोरों से अज़ाड हो गया है?
हमने दो सौ साल पहले अपनी पालिसी से
हिन्डुस्तान में ऐसे काले अन्ग्रेज़ पैदा कर दिए थे
जो हिन्डुस्तान की किसी भाषा पर न तो गर्व करें,
और न उसे राष्ट्रभाषा का सम्मान दें ।

अब भी हम ऐसे हिंडुस्टानी अन्ग्रेज़ पैदा कर रहे हैं
जिनका हिन्डुस्टान की हर व्यवस्था पर राज रहेगा ।
हिंडुस्तान पहले गोरे अन्ग्रेज़ों का ग़ुलाम था,
अब काले अन्ग्रेज़ों का रहेगा ।"

आत्मसम्मान पर आई चोट से तिलमिलाते हुए
मैने रुखाई से उस बूढ़े से पूछा, "बट हू आर यू?"
वह पुनः ठहाका लगाकर बोला,"लॉर्ड मैकाले को
बिन जाने ही टुम हिन्डी को प्रटिश्थित करने आया है ?"

यह कहकर वह बूढ़ा
मेरे पलक झपकाते ही अन्तर्धान हो गया,
परन्तु लॊर्ड मैकाले के भूत का अट्टहास
देर तक टेम्स की लहरों के साथ तैरता रहा ।