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अतीत का ठहरा ता / संतोष श्रीवास्तव

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न जाने कहाँ से
रोज जाती है
केसर के बैंजनी फूल लिए
रातों की तनहाई में
लल्लेश्वरी की वांखें

अतीत का ठहरा, बेरूखा ताल
तब नहीं रिझाता था
कैसा गुजर जाता था
राह के किनारे किनारे
हमारे सपनों की पोटली का
प्रतिबिंब लिए
 
प्रेम की पराकाष्ठा में
आहुति बनी
हाडी रानी का दर्द लिए
दूर चट्टानों से सटकर
बैठा है
सर्द रातों में अलाव
ठिठक जाते हैं राहगीर
पुरवा के झोंके में
शाकुंतलम् का पन्ना
फड़फड़ा कर
ताल की सतह पर खिले
कमल और कुमुदिनी को
थरथरा जाता था
 
कि फिर न दोहरा दी जाए
असफल प्रेम कहानी
केसर के परागों में अब
आतंक पनप रहा है
अलाव की आग में
झुलसे जा रहे हैं
प्रेम के असंख्य बीज

ताल ठहर चुका है
सतह तलहटी तक
वीरान चुप में समाया