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अलकें सँवारती (घनाक्षरी ) / ज्योत्स्ना शर्मा

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1
जीवन में चाहा है बनाना जो किसी को मीत ,
कहती हूँ दिल से कि दिल से बनाइए
तनिक न ठेस लगे टूटने न पाए डोर ,
रूठ जाए आपसे तो झट से मनाइए
कंटकों को राह के समेटने की चाह रख ,
फूल सदा खुशियों के , पथ में बिछाइए
द्वापर में कान्हा ने सुदामा से निभाई जैसे ,
वैसे मीत कलियुग में आप निभाइए
2
सबसे सुनी है यहाँ कबसे सुनी है यहाँ ,
रीत मन भावन ये पावन पुरानी है
रस मकरंद भरे मन में आनंद भरे ,
बाँधती है डोर पर लगती सुहानी है
यूँ तो हर दिन कहूँ भर के उमंग कहूँ ,
वारने को आप पे ये कम जिंदगानी है
सुख हो या दुःख साथ छोड़ेंगें न कभी हाथ
आज यही बात हमें आपसे बतानी है
3
 नमन है बार-बार शारदे माँ देना तार ,
सुन लेना इतनी सी विनय हमारी है
होकर विकल कहे कलम हमारी आज ,
धर्म को निभाने की हमारी भी तो बारी है
भारत से ,भारती माँ ,जाने की ज़रा न चाह ,
जब तक जननी न मुदित निहारी है
आप बंधनों से आज खोल दीजिये न हाथ ,
एक-एक वीर मेरा सैकड़ों पे भारी है ६
4
पवन भी गाये आज वन्दना तुम्हारी झूम ,
सरस दिशा-दिशा सनेह से दुलारती
हरा-भरा लंहगा सुनहरी लाई ओढ़नी ,
कलियों को गूँथ-गूँथ अलकें संवारती
मन में भरी उमंग साजते हैं सप्तरंग ,
रुचिर घटा भी देख सुरधनु वारती
केसरिया ,सित ,हरा ,भोग,योग ,त्याग भरा ,
मन में बसे हैं मेरे तीन रंग भारती
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