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अविश्वासी मौसम / सफ़दर इमाम क़ादरी

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एक रोज़
ज़्यादा ऊँचाई की तरफ़ हम बढ़ रहे थे
कार के बंद शीशे से दूर
पहाड, आसमान और बादलों का खेल
बिल्कुल अनजाना लग रहा था
मौलाना रोम<ref>फ़ारसी के महान कवि</ref> ने सहवास के समय
औरतों के ज़िस्म को
नान-बा<ref>नानबाई, जो नान और पावरोटी तथा बिस्कुट आदि बनाता है</ref> के हाथ में
ख़मीर आटे की हर क्षण
बनती और बदलती शक्लों और सूरतों से
स्पष्ट किया था
उस रोज़ पहाड़ के ज़िस्म-व-जान के हाल्कुछ ऐसे ही रहे होंगे
मेरे मुँह से निकल गया--
ये पहाड़ कितने नर्म और मुलायम हैं!
ड्राइवर ने इशारा किया...
शायद आप 'स्नो-फ़ाल' देख सकें
तो क्या बादल और पहाड़ के 'मधुर-मिलन' से
बर्फ़बारी होती है?
साढ़े ग्यारह हज़ार फ़ुट पहुँचते ही
अचानक सर्दी का एहसास बढ़ा
अंदर से गुदगुदी होने लगी
मौसम ज़रा भारी हो गया
हमने जैकेट पर देखा
बर्फ़ के फाहे
अपनी शक्ल जाहिर कर रहे हैं
घोड़ों पर सवार होकर
तीन-चार किलोमीटर ऊपर पहुँचते ही
जिस रौशन धूप ने हमारा स्वागत किया
वह देखने लायक था
मुझे पहाड़ों के बदलते मौसमों का
अविश्वासी होना अच्छा लगा!

शब्दार्थ
<references/>