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एक दरिया दर्द का / संतोष श्रीवास्तव
Kavita Kosh से
वह तना खड़ा है
मेरे सामने
सवालों का पिटारा लिए
वह मेरी क़लम को
ललकार रहा है
तुमने स्त्री से जुड़े
हर कोने की पड़ताल की
दलित के
घावों को सहलाया
और तो और पुरुष की
नपुंसकता भी
नहीं भूलीं तुम।
लेकिन भूल गईं ज़िन्दगी का
वह तिरस्कृत हिस्सा
जिसमें
मजबूर था जीने को
किन्नर समूह
जहाँ हवन भी हम
आहुति भी हम,
धुआँ भी हम
तुम उस धुँए में
नहीं देख पाईं
हमारी निरर्थक
अपूर्ण ज़िन्दगी
न पिता कहाय ,न माँ
अभिशप्त ,तिरस्कृत ,बहिष्कृत
यह सच तो दिखातीं
समाज को
पर तुम भी तो उसी
समाज का
हिस्सा हो न
कैसे लिखतीं किन्नरों के
दर्द के परनाले
और वह ताली बजाता
भीड़ में गुम हो गया
और मेरे सामने उड़ते रहे
शूल से चुभते रहे
मेरी किताबों के पन्ने