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और वह चला गया / जयप्रकाश कर्दम
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अपने ही घर आंगन में
छला जाकर अपनों से ही
होता रहा आहत
सह-सहकर पदाघात
बन गया वह पत्थर सा
डटा रहा फिर भी निरंतर
आग के मैदान में
खदबदाता रहा सदियों के
संताप के विरूद्ध
भटकता रहा
इंसानियत के बियाबान में
अमानवीयता का दंश लिए
छटपटाहट नहीं थी उसे
मसीहा बनने की
न स्वयं को इतिहास में
दर्ज कराने की
इतिहास बनने की बजाए
जीवंत बनना चुना उसने
उसने बयान की मूक माटी की मुखरता
उगाए सवालों के सूरज
लिखनी चाही उसने जिंदगी की तहरीर
लिखता चला गया दर्द की कविताएं
संघर्ष के गीत
अधूरी रह गयी उसकी कहानी
और वह चला गया
उजले धुंए की लकीर सा
सीने में सुलगता ज्वालामुखी लिए।
(नोट: दिवंगत दलित साहित्यकार डॉ. पुरूषोत्तम ‘सत्यप्रेमी’ की स्मृति में)