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कैकेयी के अज्ञासँ राम वन गेला / मैथिली लोकगीत

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मैथिली लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

कैकेयी के अज्ञासँ राम वन गेला
सीता ओ लछुमन सेहो संग भेला
सुर के नाचबऽ लय, निशिचर के मारऽ लय
रामजी गेला बनबास,
काटल रावण के दसो कपार
सुरसरि के तट पर जखन राम गेला
केवट सँ भेलिन बहुत झमेला
किछु नहि केलक ओ, चरण दबेलक ओ
केलक अपन कुल उद्धार,
काटल रावण के दसो कपार
पंचवटी मे डेरा खसौलनि
भरत-शत्रुध्न सेहो भेंट भेलनि
राम के समझाबऽ लय, राम के बुझाबऽ लय
रामजी गेला बनबास,
काटल रावण के दसो कपार
हाथक अंगुठी सेहो फेकि देलनि
ई हाल सुग्रीव प्रभु केँ सुनौलनि
सीता केँ ताकऽ लय, लंका सँ आनऽ लय
चलला राम सुकुमार,
काटल रावण के दसो कपार
चौदह बरस राम बनहि बितौलनि
बनहि मे शबरी के अँईठ बइर खयलनि
लछुमन, वैदेही सँ, परम सनेही सँ
भेलनि कष्ट अपार, काटल रावण के दसो कपार
साधु के भेख धऽ रावण अबैया
सीता पुनीत के हरलक मुदैया
सीता कहथि धीर, नयन सँ बहनि नीर
कहलनि प्राण आधार, काटल रावण के दसो कपार
जग के बुझाबऽ लय, जग के समझाबऽ लय
बिष्णु लेलनि अवतार, काटल रावण के दसो कपार