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कॉक्रोच / अरुण कुमार नागपाल

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जूतों और डिब्बों में छिप कर
जीने का चलन
तलुवों में रहने और डर-डर कर जीने की संस्कृति
कॉक्रोच का जीना भी कोई जीना है
उसका तो केवल अस्तित्व भर होता है

उसका जीवन मरण
सिर्फ़ अपने तक सीमित है
कॉक्रोच के जीवन मूल्य नहीं होते
वह कोई आदर्श नहीं पालता
उसे तो बस पेट भरना
और छुप-छुप जीना आता है

कॉक्रोच पालता है
सुरक्षित होने का भ्रम
पर दरसल जान उसकी
हरपल दाँव पर लगी रहती है
हर वक्त ख़तरा बना रहता है
कॉक्रोच रेंगता है डर की अजान राहों पर

रसोईघर के फ़र्श पर रेंगता हुआ
कभी भी कुचला जा सकता है कॉक्रोच

बाथरुम की नाली से
घर में प्रवेश कर रहे
कॉक्रोच पर फ़िनिट की बारिश कर
उसका ख़ात्मा किया जा सकता है
कॉक्रोच जीते- जी
चलते-चलते
मरता है
लड़ते-लड़ते नहीं
वीरगति को प्राप्त नहीं होता
शहीद नहीं होता
अमर नहीं होता
शिकार हो जाता है
कभी भी
छिपकली का
कॉक्रोच.