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तुम्हारी तरह / संतोष श्रीवास्तव

चाँद
मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ
अद्भुत इतिहास रचा है तुमने
जानना चाहती हूँ
कौन हो तुम ?

अत्रि अनुसूया के पुत्र
दक्ष की सत्ताइस पुत्रियों के पति
रोहिणी के प्रेम पाश में आसक्त
कितनी कितनी बार
तिरस्कृत ,शापित तुम
पूर्णता को खो
बंट गए शुक्ल ,कृष्ण पक्ष में

सोलह कलाओं के स्वामी होकर भी
 बस एक दिन की पूर्णता ही
झोली में आई तुम्हारे
जबकि तुमने
कभी कोई भेद नहीं रखा
हर धर्म को स्वीकार कर तुम
पूजित ,सहज ,पावन हुए

शिव की जटाओं से लेकर
ग्रहण से ग्रसित होने तक
वास रहा तुम्हारा
इस निरंतरता में
लड़खड़ाए नहीं तुम

सत्ताइस पत्नियों के बावजूद
पूरब से पश्चिम तक का
रात्रिकालीन एकाकी सफ़र
कौतूहल जगाता है मुझ में

इसीलिए तो चाहती हूँ
तुम्हारा साक्षात्कार
तुम्हारी उज्ज्वलता में समाहित हो
प्यार, विश्वास ,शीतलता
सुंदरता के अर्थ जानना चाहती हूँ

इस विराट सूनेपन का हिस्सा हो
निःशब्द रात्रि के किसी प्रहर
चाहती हूँ पाना ख़ुद को
ठीक तुम्हारी तरह