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तुम्हारे इल्म की हाक़िम कोई तो थाह हो / इष्टदेव सांकृत्यायन

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तुम्हारे इल्म की हाक़िम कोई तो थाह हो ।
कोई एक तो बताओ, यह कि वह राह हो ।

जेब देखते हैं सब स्याह हो कि हो सफ़ेद,
कौन पूछता है अब चोर हो या साह हो ।

अँगूर क्या मकोय तक हो गए खट्टे यहाँ,
सोच में है कलुआ अब किस तरह निबाह हो ।

दर्द सिर्फ़ रिस रहा हो जिसके रोम-रोम से,
उस थके मजूर को क्या किसी की चाह हो ।

दिखो कुछ, कहो कुछ, सुनो कुछ, करो और कुछ,
तुम्हीं बताओ तुमसे किस तरह सलाह हो ।

की नहीं बारिशों से कभी मोहलत की गुज़ारिश,
निकले तो बस निकल पड़े भले पूस माह हो ।

मत बनो सुकरात कि सिर क़लम हो जाएगा,
अदा से फ़ालतू बातें करो, वाह-वाह हो ।