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नश्तर / राजेंद्र तिवारी 'सूरज'

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ग़मों के गीत गुनगुनाऊं क्या?
कुछ तुम्हें फिर नया सुनाऊँ क्या?

आँधिया कब की रुक गयीं हैं ..दोस्त ..
उनको आवाज़ दे बुलाऊँ क्या ?

उसके ज़ख्मों में ताज़गी है अभी ..
फिर से नश्तर वहीं चुभाऊँ क्या?

दोस्त महंगे से हो गए हैं अब ...
दुश्मनों को गले लगाऊँ क्या?

इश्क..क्या है ये जानना है तुम्हें ?
फिर से ख़ुद अपना घर जलाऊँ क्या ?

ग़मों के गीत गुनगुनाऊं क्या?
कुछ तुम्हें फिर नया सुनाऊँ क्या?