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नाम का इस बार चौमासा रहा / पुरुषोत्तम प्रतीक

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नाम का इस बार चौमासा रहा
बादलों का गाँव ख़ुद प्यासा रहा

फिर वही क़बरें, फिर वहीऒ सुर्ख़ियाँ
आज का अख़बार भी बासा रहा

सब कलाओं की वही तो जान है
जो हमारी जान का रासा रहा

शेर बनकर शब्द मिमियाने लगे
ब्रह्म के इस काम का हाँसा रहा

आपने पानी बहुत पहना मगर
रेत का हर अंग दुरवासा रहा