भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

प्याज की एक गाँठ / भगवत रावत

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

चार रुपए किलो प्याज
आवाज लगाई
बशीर भाई ने
मैं चौंका
वे हँस कर बोले
ले जाइए साहब
हफ्ते भर बाद
यही भाव याद आएगा
अल्लाह जाने
यह सिलसिला
कहाँ तक जाएगा
जेब में हाथ डालते हुए
मैंने कहा
आधा किलो
सुन कर बशीर भाई कुछ बोले नहीं
और एक की जगह
आधा किलो तौलते हुए मेरे लिए
ऐसा लगा
जैसे कुछ मुश्किल में पड़ गए
उनकी तराजू का
भारी वाला पलड़ा
हमेशा की तुलना में
आज कुछ कम नीचे झुका
प्याज की एक गाँठ
और उतारें या न उतारें
इस सोच में
उनका हाथ
ग्राहक से रिश्ता तय करता था
एक क्षण को
हवा में रुका
और आखिरकार
बशीर भाई जीत गए
मैं रास्ते भर
झोले में डाली
प्याज की उस एक गाँठ को
आँखों में लिए-लिए
घर लौटा।