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प्रेम स्मृति-7 / समीर बरन नन्दी

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बचपन चला जाता है --
खरगोश की तरह भाग कर ।

फिर ऊँची चोटी पर
चढ़ने के रह जाते हैं घाव ।

(पर तुम्हे तो मिलता रहता है
ह्रदय-वृत्त में चुम्बन)

सभी इस डाल पर मन-माफ़िक बैठ कर
पाते हैं अपना अपना हिस्सा ।

फिर शाखा प्रशाखाओं में चले जाते हैं
अपने-अपने गद्यों में....

इस तरह से पेड़ मनुष्य का जीवन बढ़ता रहता है
बढ़ता रहता है कविता का अनन्त जीवन...