भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

फूलों से बतियाये देर हुई / कुमार रवींद्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

फूलों से बतियाये
सजनी, देर हुई

वह जो जोड़ा बैठा
घाटी में नीचे
क्या हम-तुम हैं? -
देखो वे आँखें मींचे

छुईं उँगलियाँ
दोनों की मिट गई दुई

यह जो है रोमांस हवा में -
हमने सिरजा कल
फूलों से भर गया तभी था
घाटी का आँचल

बादल है वह
या है धुनकी हुई रुई

हम लौटे हैं
कई बरस के बाद इधर
पत्थर-हुए शहर में लीं
साँसें बंजर

फटी चदरिया
सिली जतन से - चुभी सुई