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बंदनवार (कविता) / तेज राम शर्मा

छत पर जमीं बर्फ़
फिघलती रही दिन भर
फिर शीत लहर
में काँपते रहे तारे रात भर
टपकती बूँदें काँपी ठिठुरीं
बीच में ही अटक गईँ

बर्फ़ रात भर
हीरे-मोतियों के बंदनवार
टांगती रही छत के चारों ओर
कि भोर होते ही स्वागत कर सकें
उस तेज-पुरुष का
पर आलोक स्पर्श पाते ही
क्षण भर की वह हीरक चमक
और उसका सारा संचित स्नेह
टप-टप बह गया

भोर में तारों की आँखों में
चौंध लगी
और वे भी धूप चादर खींचे
मुँह पर ढाँपे सो गए

शिशिर की इस रात में
उसके स्वागत में
मैं बंदनवार न टाँग सका
पर मैं भी दुबका पड़ा हूँ
कि कोई आलोक किरण
मुझे भी छू जाए
मुझे भी तपा जाए
मैं भी गलूँ
पिघलूँ
मोतियों की बूँदें बन बहूँ
इस शिशिर की शीत में भी।