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यह भारत तभी से रो रहा है / संजय तिवारी

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तुमसे बहुत पहले
उत्तरा के अनुत्तरित प्रश्नो को
उत्तर की तलाश थी
लेकिन उत्तरा ने वह कुछ नहीं किया
जैसा तुमने किया
न बुद्धि में कम थी
न भावना में नम थी
न आसुओ की कमी थी
न कोई इच्छा दबी थी
वह स्त्री थी
फिर भी बहुत भारी रही
तुम जैसे महा आत्माओ की
आभारी रही
और एक थे तुम?
ढाई हजार साल की
उत्तरा की उसी अनथक
हजारो साल की यात्रा की
महानता को कर के कलंकित
क्या मिला?
उत्तरा से यशोधरा तक की
मेरी ही यात्रा को
क्यों बाधित किया?
आखिर क्यों?
मैं उत्तरा तो नहीं?
यशोधरा ही हूँ?
वही यशोधरा
जिसके पास न तो कोई उत्तर है
राहुल के मासूम प्रश्नो का
और न प्रतीक्षा है
राहुल के पिता के लौटने की
एक महानायक की महानीति की
ढाई हजार वर्षो की अविरलता
ज्ञान की निरंतरता
दान की पवित्रता
मान की मनःचेतना
प्राण की संकल्पना
अनुमान की आधारशिला
अपमान की अनिश्चितता
और
अनुमान की प्रामाणिकता
यू ही नष्ट नहीं हो सकती
सिद्धार्थ?
तुम्हारा बुद्ध बनना बहुत भारी हो रहा है
यह भारत, जानते हो?
तभी से रो रहा है
धम्म के धमाल ने
तोड़ दिए हैं प्रतिबन्ध सनातनता के
आक्रान्त? वेगवती धारा के लिए
तुम्ही ने खोल दिए
सारे द्वार
देखो? कैसे घुसे चले आ रहे हैं?
भारती का मान मर्दन करते हुए?
न वेद रक्षित रहे
न पुराण संचित रहे
न मीमांसा बची
न इतिहास
अब केवल छट कर बच गया इतिहास
भारत के लिए? भारत का नहीं
केवल तुमसे? तुम तक
और तुम्हारे बाद
एक विधवा के प्रलाप की तरह।