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रामी / बलदेव प्रसाद शर्मा 'दीन'

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‘बाटा गोड़ाई<ref>रास्ते में गोडनेवाली</ref> क्या तेरो नौं<ref>नाम</ref> छ, बोल, बौराणि<ref>स्त्री</ref> कख तेरो गौंछ<ref>गाँव</ref>?’
‘बटोही-जोगी! न पूछ मैकू। केकु पुछदि, क्या चैंद दवैकू?
रौतु<ref>रावत</ref> की बेटि छौ, रामी नौछ। सेटु की ब्वारि छौं, पालि गौछ।
मेरा स्वामी न भी छोड़ी घबर। निर्दयी ह्वे गैने मई पअर।
ज्यूरा<ref>विधाता</ref> का घर नी जगा मैकू। स्वामि विछोह होयूं च जैंकू।
रामी तैं स्वामी को याद ऐगे। हाय-कूटिल<ref>कुटला</ref> छूटण लैगे।
‘चल, बौराणी, छैलू<ref>छाया</ref> बैठी जौला। आपड़ी खैरी<ref>कथा</ref> उखीमू लीला।’
‘जा, जोगी, अपड़ा बाठा लागण। मेरा सरील ना लऊ आगअ।
जोगी ह्वेकी भी आंखी नि खूली। छैलू बैठलि त्यरि दीदी-भूली।’
‘बौराणी! गाली नी देणी भोतअ। करव रैंद गौंको सयाणो रौतअ?’
जोगी न गौं मा अलंक लाई। भूखो छौं, भोजन देवा मई।
बूडडी माइ तैं दया ऐगे। खेतु से ब्बारी बुलौण लैगे।
‘घअर और ब्वारी तू। झट कैकअ। घर मू भूखो चअ साधु एकज।’
‘सासु जी, कैकू बुलाये रौलअ<ref>सास</ref>। ये जोगी लगीगै आज बौलअ<ref>पागलपन</ref>।
ये जोगी कू नि पकांदू रोटी। गालि देने येन खोटी-खोटी।
ये पापी जोगी शरम नीचअ। कैकुतैं आये हमारा बीचअ?“
‘अपड़ी ब्वारी समझऊ भाई। भूखो छौं, मात बणावा जाई।’
रामि रुसाड़ों<ref>रसोई</ref> झुलयोण लैगे। स्वामी की याद भी औण लैगे।
‘मा लू का पात मा धारे मातअ। भी तेरा भात नी लांदु हाय।
रामी का स्वामी की थालि माजअ भात दे, रोटि मै खैलो आज।’
”खांदु छै जोगी तअखाई लेदा। नी खांदो जोगी तअजाई लैदी।
भतेरा जोगी झोलीऊ ल्हीकअ। रोजाना घूमि निपौंदा भीकअ।“
जोगी न आखीर भेद खोले। बूडडी माई से इनो बोले।
”मैं छऊं माता तुम्हारी जायो। आज नौ साल से घअर आयों।“

शब्दार्थ
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