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विश्वरूप / जगन्नाथप्रसाद 'मिलिंद'

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मत मर्म-व्यथा छूने, विद्युत बन, आओ;
बन निबिड़-श्याम घन, प्राणों में छा जाओ।
किरणों की उलझन क्षणिक, न बनो सवेरा;
बन निशा डुबा दो छवि में जीवन मेरा।
अस्थिर जीवन-कण बन न नयन ललचाओ;
बन शांत मरण-सागर असीम, लहराओ।
जो टूट पड़े क्षण में विनाश-इंगित पर,
वह तारक बन मत ध्यान भंग कर जाओ;
जिसकी अंचल-छाया में सोवे त्रिभुवन,
वह अंतहीन आकाश नील बन आओ।
फिर उसी रूप से नयनों को न भुलाओ;
अभिनव अपूर्व छवि जीवन को दिखलाओ।
दर्शन-सुख की परिभाषा नई बनाओ;
लघु दृग-तारों में नहीं, हृदय में आओ।
वह विश्वरूप बन आओ, मेरे सुंदर,
जो रेखाओं का बंदी बने न पट पर;
जिसको भर रखने को तप कर जीवन-भर
उर बने एक-दिन अंतहीन नीलांबर।
अनुभव को नयनों तक सीमित न बनाओ;
छवि से जीवन के अणु-अणु को भर जाओ।
हर झाँकी में विस्तृततर बन कर आओ;
जग के प्राणों की प्रति-क्षण परिधि बढ़ाओ।