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सागर का विस्तार गगन तक / कविता भट्ट

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सागर का विस्तार गगन तक
हे प्रिय सागर का विस्तार
क्षण पल मृदु कण सत्त्व-समाश्रित
कुछ अनंत और शेष अपार,
बूँद निरर्थक नहीं प्रेम की
हे प्रिय मोती-सीप अपार
 मेरे मन से तेरे मन तक
बादल प्रतिफल अमृत के प्रसार
सागर का विस्तार गगन तक
हे प्रिय सागर का विस्तार 