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सात फुटकर शेर / फ़ानी बदायूनी

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उनके तो दिल से नक़्शे-कुदूरत<ref>द्वेष भाव</ref> भी मिट गया।

हम शाद<ref>प्रसन्न</ref> हैं कि दिल में कुदूरत नहीं रही॥


ज़िन्दगी ख़ुद क्या ‘फ़ानी’ यह तो क्या कहिये मगर।

मौत कहते हैं जिसे वो ज़िन्दगी का होश है॥


न दिल के ज़्रर्फ़ को<ref>पात्रता को</ref> देखो तूर<ref>एक पर्वत का नाम</ref> को देखो।

बला की धुन है तुम्हें बिजलियाँ गिराने की॥


कल तक जो तुम से कह न सका हाले-इज़्तराब<ref>तड़प की खबर</ref>।

मिलती है आज उसकी ख़बर इज़्तराब से॥


मुद्दआ़ है कि मुद्दआ़ न कहूँ।

पूछते हैं कि मुद्दआ़ क्या है?॥


दुश्मने-जाँ थे तो जाने-मुद्दआ़ क्यों हो गये?

तुम किसी की ज़िन्दगी का आसरा क्यों हो गये?


ज़िन्दगी यादे-दोस्त है यानी--

ज़िन्दगी है तो ग़म में गुज़रेगी॥


शब्दार्थ
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