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सेहन्ता / गंग नहौन / निशाकर
Kavita Kosh से
चिड़ै
चुनैछ
चापाकाल पर पसरल
डेकचीक भात
पीबैछ
सागरसँ खाधि धरिक जल।
चिड़ै
मनबैछ
अकासमे हनीमून
नहाइछ
बरखाक फुहारमे
पाँखि पसारि।
खोंता उजरला पर
चिचिआइत रहैछ
अपन भाखामे।
चिड़ैकें
छै सेहन्ता
सभ जीवकें होअए
अपन गलतीक जनतब
बरसैत रहए
नेहक बदरी
धरती पर
फुलाइत रहए
शान्तिक फूल।