भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

हर हुनर हासिल किया दिल में उतरने के सिवा / रवि सिन्हा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हर हुनर हासिल किया दिल में उतरने के सिवा 
गुफ़्तगू आसान है बस ख़ुद से करने के सिवा

बात वो करते नहीं जो बात बनने की न हो 
बात का होना भला क्या अब बिगड़ने के सिवा 

सच परेशाँ हर तमाशे में हक़ीक़त डाल दे
झूठ को क्या काम ठहरा सच से लड़ने के सिवा

इल्म का छोटा जज़ीरा<ref>- टापू (island)</ref> बेकराँ<ref>असीमित (unbounded)</ref> बह्रे-हयात<ref>ज़िन्दगी का समुद्र (ocean of life)</ref>  
क्या करे कोई तमन्ना डूब मरने के सिवा

शक़्ल आँधी को अता कर थमा दे रहमत या बर्क़<ref>बिजली (lightning)</ref>
दश्त<ref>रेगिस्तान (desert)</ref> में होना भी क्या है धूल उड़ने के सिवा

वो हिमाला बैठ के सैलाब को देखा किए
नूहे-हिन्दुस्तान क्या करते ये करने के सिवा

झाँकती हैं अब मशीनें आदमी की रूह में 
अब ख़ुदी को राह क्या गहरे उतरने के सिवा

शाख़ से हर शाख़ तक की मंज़िलें सारी तमाम
ख़ला<ref>शून्य, अन्तरिक्ष (space)</ref> लामहदूद<ref>असीमित (unbounded)</ref> अब क्या अज़्म<ref>संकल्प (determination, intention)</ref> उड़ने के सिवा 

बात आगे मुख़्तसर है औ’ गुज़श्ता<ref>अतीत (past)</ref> है तवील<ref>दीर्घ (long)</ref>
काम भी अब क्या बचा है याद रखने के सिवा

शब्दार्थ
<references/>