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'किस बला का जोश जानां तेरे दीवाने में है / कांतिमोहन 'सोज़'

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अकबर इलाहाबादी ने लिखा है --
किस बला का जोश जानां तेरे दीवाने में है ।
कल ज़मानत पर छुटा था आज फिर थाने में है ।

उन्हीं की तर्ज़ पर --

’किस बला का जोश जानां तेरे दीवाने में है ।
कल ज़मानत पर छुटा था आज फिर थाने में है ।’

ज़िन्दगी भर ज़ुल्म सहकर लोग उफ़ करते नहीं
वो समझता है मज़ा घुट-घुटके मर जाने में है ।

और क्या रक्खा है चलकर उसको शर्मिन्दा करें
लोग कहते हैं कि जादू उसके शरमाने में है ।

खार गो क़ायम रहा खिल तो नहीं पाया कभी
ज़िन्दगी एक फूल की खिलकर बिखर जाने में है ।

उस फ़रिश्ते से मिलोगे जिसका शैतां नाम है
कल तलक वो ख़ुल्द[1] में था आजकल थाने में है ।

ख़ैरियत क्या पूछते हो खैरियत अब है कहाँ
दर हक़ीक़त खैरियत अब सिर्फ़ मर जाने में है ।

ख़ौफ़ से ज़ाहिद के मस्जिद में नहीं जाते थे सोज़
अब ये सुनते हैं कि वो कमबख़्त मयख़ाने में है ।।

शब्दार्थ
  1. स्वर्ग