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'तू' / पढ़ीस

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मिला न तू, तेरी तसवीर समाई दिल में;
आरजू-दीद[1] तेरी दिल ने लगाई दिल में।
हिज्र[2] में तेरे पशेमाँ[3] न कहें मुझको रक़ीब [4];
तेरी तरवीर ही जब दिल ने बनाई दिल में।
क्यों कहें, किससे कहें, भाता है तू क्यों मुझको ?
तेरी तसवीर ही जब दिल ने चुराई दिल में।
तु है बेनाज[5], मगर मैं हुआ नाज़ाँ[6] तुझ पर;
पस, इसी से तेरी तसवीर चुराई दिल नें।
यह सही है कि तू कहलाता है चितचोर बड़ा;
पर किसी ने तेरी तसवीर चुराई दिल में।
मुकट की शान पै क़ुरबान हो गया काफ़िर;
डर ही क्या यार की तसवीर चुराई दिल ने।

शब्दार्थ
  1. देखने की इच्छा
  2. राह, मार्ग, तड़पना
  3. परेशान, शर्मिन्दा
  4. एक ही माशूक के दो चाहने वालों के परस्पर सम्बम्ध-फारसी शब्द ‘रकाबत’ से बना है
  5. अभिमान रहित, बिना घमंड के
  6. नाज़ या नखरा सहने वाला