भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

'. . . . .कोई खो गया है' / जंगवीर स‍िंंह 'राकेश'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हृदय-नगरी में बड़ा शोर मचा है
शायद ! कोई अन्दर खो गया है

कुछ झूमती हुई , बदहवासियाँ,
शोर मचाती चिल्लाती खामोशियाँ
मन के, नीले गगन में उड़ती रहीं
कुछ जवान-चंचल चिड़ियों की तरह!

मैंने दिल से पूछा, दिल रो पड़ा है
शायद ! कोई अन्दर खो गया है!

दु:खों में क्या पत्थर भी रोते हैं कोई
अक्स चूमते – धरा भिगोते हैं कोई?
जब सारा जग सोता है हम जागते हैं
या फिर अपना बुत ख़ुदी तराशते हैं !

मेरे हृदय में पूरा संसार बसा है
और ज़िस्म पत्थर का हो गया है
शायद ! कोई अन्दर खो गया है!