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अँधेरी रात की बरसात / मणिभूषण सिंह

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रात भर पड़ती रही थी बूँद,
नभ में रात भर तारे नहीं थे।
रात भर स्मृति-सी
चमकती बिजलियों की
आग से तपती घटाएँ;
किसी गहरी वेदना में
यूँ गरजती थीं...
कि जैसे खोजती हों...
रजत विजड़ित स्वप्न का सुख,
या प्रणयिनी के नयन का हास,
या बीते दिनों का हर्षमय उल्लास,
जब आकाश तिमिरांकित नहीं था!
 
धवल निर्मल चाँदनी थी,
व्योम का आँगन सितारों से सजा था।
सब तरफ बस स्निग्ध, शीतल,
शांतिमय वातावरण में
नेह का मधुरस भरा था,
और जैसे दिव्य श्वासोच्छ्वास-सी
मंथर हवाएँ डोलती थीं।
 
विकल मन पर
उमड़ बहते
ख़्वाब के सैलाब को
उस वक़्त तक
बाँधा नहीं था।
कल्पना उन्मादिनी के
विकच व्याकुल भाव के संभार को
मति-मेखला से
तब तलक साधा नहीं था।
 
रात भर होती रही बरसात,
बाहर और अंदर धुल चुका था!
चित्र स्मृतियों के मनोरम
त्वरित-गति अविराम से
मन के पटल पर
बह रहे थे!!
खुल रही थीं
ग्रंथियाँ सविशेष,
रह-रह कर स्वयं के क्रोड़ में;
विद्युत विभा वैभव लुटातीं!!!
 
दीप्तिमय प्रज्ञान
अंतः का बहिः तक
और सुख का भान
दुख के घनपटल पर।
 
तूलिका मन की
विचारों से रँगी,
कुछ शून्य का आस्वाद लेकर
मौन-सुमुखर,
शांत-उच्छल...
दिग्गयंदों के उदग्राघात को
विस्तीर्ण हृत्तल पर
सहज अंकित किये,
कँपती रही थी रात भर तक,
कूँचियों से अंकुशों के स्पर्श
पूरी देह पर,
हर रंग बरसाते रहे थे।
और पूरी रात बारिश हँस रही थी।
 
तूलिका मन की,
बहिः के तड़ित से थी पूछती
कुछ प्रश्न जैसे,
व्योम के पर्दे हिलाकर
बादलों के पार से
वह कौन रोया था
कि जिसकी गर्जनामय चीख सुनकर
रात्रि की निस्तब्धता के बीच
बूँदों के विषम संगीत में
कल रात भर छाती हिली थी?
 
छिटकती उन बिजलियों में
दृष्टि किसकी
पार नभ से
धरित्री पर पड़ रही थी?
 
कौन था वह
जो जगा था रात भर
बरसात का संगीत सुनता,
बादलों के राग से
उर की सुपुष्कल
रागिनी का मेल रखता?
 
कौन था वह
जो अगम का सुगम से
संवाद सुनकर जग रहा था
रात भर कल?
 
रात भर बरसात का स्वर
कान में पड़ता रहा था,
इस तरह;
जैसे कि अंतर्तूलिका को
मिल रहे हों
प्रश्न के हल।
किन्तु मन की तूलिका ने
जलकणों की वृष्टि से
युगपत समागत उत्तरों को
प्रश्न के विभ्रम विकर से
कर समेकित
सृष्टिगत शून्यत्व का
साधन किया था,
रात भर तक।
रात भर पड़ती रही थी बूँद,
नभ में रात भर तारे नहीं थे।