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अँधेरी रैन में जब दीप जगमगावतु एँ / नवीन सी. चतुर्वेदी

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अँधेरी रैन में जब दीप जगमगावतु एँ।
अमा कूँ बैठें ई बैठें घुमेर आमतु एँ॥

अब’न के दूध सूँ मक्खन की आस का करनी।
दही बिलोइ कें मठ्ठा ई चीर पामतु एँ॥

अब उन के ताईं लड़कपन कहाँ सूँ लामें हम।
जो पढते-पढते कुटम्बन के बोझ उठामतु एँ॥

हमारे गाम ई हम कूँ सहेजत्वें साहब।
सहर तौ हम कूँ सपत्तौ ई लील जामतु एँ॥

सिपाहियन की बहुरियन कौ दीप-दान अजब।
पिया के नेह में हिरदेन कूँ जरामतु एँ॥

तरस गए एँ तकत बाट चित्रकूट के घाट।
न राम आमें न भगतन की तिस बुझामतु एँ॥