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अंकुरण / अंतर्यात्रा / परंतप मिश्र

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मुझमें एक बीज पलता है
जीवन के साहचर्य के साथ सुप्तावस्था में
जान न सका कभी उसकी उपस्थिति को
हृदय भूमि की नम उर्वरा शक्ति के साथ
पर, जब मैंने महसूस किया।

एक अंकुरण की अनुभूति
अपरिचित पीड़ा की मधुर मिठास
कुछ घटित हो रहा था नवीन।

मानो बहुप्रतीक्षित विकास की पदचाप
आलौकिक आनंद परिवर्तन के साथ,
नई कोपलें सहमी हुई सी फूटीं
अपनी उपस्थिति की घोषणा करती
मेरी भावनाओं की शीतल बौछार से
मुझमे एक नव जीवन ने
सुकुमार पौधे का रूप ले लिया

एक सहजीवन का आरम्भ
हृदय में एक सुखद हलचल
पौधे के कोमल पत्तों का स्पर्श
बहुत ही प्रिय और अव्यक्त प्रेम
जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका था

मैंने अपने लहू से सींचा था इसे
अपने साँसों को उडेला था उसकी पत्तियों में
ताजगी दी थी अपने विचारों की
प्रकाशित किया था उसे अंतरात्मा के प्रकाश से
कोमल भावनाओं का दुलार दिया था।

मन ने पूर्णतया स्वीकार किया था
कहीं सूख न जाये
बासी न हो जाए
क्योंकि अब तुम्हारी
अपनी जड़ें, पत्तियाँ और टहनियाँ मेरी पहचान हैं
मेरा जीवन सहअस्तित्व का परिणाम हैं

एक सुंदर सपना जैसा लगता है सबकुछ
अब प्रतीक्षित है
इस सहजीवन के उपहार स्वरूप
तुम्हारी टहनी पर एक सुंदर कली का आगमन
जो सम्पूर्ण जगत को सुवासित कर दे
अपनी प्राकृतिक मादक सुगंध से