भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अंखियाँ हरि दरसन की प्यासी / भजन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अंखियाँ हरि दरसन की प्यासी।

देख्यौ चाहति कमलनैन कौ,
निसि-दिन रहति उदासी।।

आए ऊधै फिरि गए आँगन,
डारि गए गर फांसी।

केसरि तिलक मोतिन की माला,
वृन्दावन के बासी।।

काहू के मन को कोउ न जानत,
लोगन के मन हांसी।

सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ,
करवत लैहौं कासी।।