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अंगिका दोहे / सुधीर कुमार 'प्रोग्रामर'

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साक्षरता के नाम पर, सगरे हूवै लूट,
ऊपर सं नीचे तक छै, लूट करै के छूट।

सबसेॅ बड़का हुनिए छै, जत्ते बोलै झूठ,
सच्चो कं लूचबा मिली, मुक्का मारी कूट।

घूस खाय में मेल छै, बाँट चीट में टूट
सड़कऽ पेॅ घोलटल जाय, धोती केरऽ खूट।

मनत्री सें सनत्री बड़ऽ, जे गेटऽ पर खाड़,
मनत्री के कि मजाल छै, सनत्री कें दै झाड़?

उलट-पुलट नित होय छै, अदालत मेॅ कुछ केस,
कल्कऽ मरल सजी-धजी, आबै दुल्हिन भेष।

तासा बजै बाजार मेॅ, छत पर भीड़ अपार,
ऊपर सुंदर देखी केॅ, नीचे मारा-मार।

दुल्हा दारु पीवी केॅ,पगड़ी देल बजाड़,
दुल्हिन तें अकबक करै, देखी आढ़ किबाड़।

बोतल पर बोतल टुटै, जलखै फेकल जाय,
भाड़ा कं कपड़ा पिन्ही, नाली गिरी नहाय।

खस्सी मुर्गा के बिना, बढ़ियां बिहा न होय,
खाय खूब गूड़ियाय केॅ, पत्ते हाथो धोय।