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अंगिका रामायण / छठा सर्ग / भाग 13 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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एहन किरति जब सुरपति करतै तेॅ
आम जन उपर प्रभाव कोन परतै?
इन्द्र के रोॅ आचरण करतै मनुष्य यदि
नैतिक धरम पथ सहजें बिगरतै।
इन्द्र के समान यदि भूपति नरेश होत
धन मदें सब-टा कुपंथ में उतरतै।
नारी होत अबला, न शक्ति के प्रतीक होत
एहनोॅ में श्रुति पंथ सहजें बिगरतै॥121॥

दोहा -

सुरपति के ई हाल छेॅ, भूपति के की हाल?
भठत लोग मद्पाय केॅ, होत धरम बदहाल॥15॥

इन्द्रदेव छिपल कमल वन में रहल
उबरै के जब कोनों जुगति न पैलका।
आरत के बस ब्रह्मदेव के बोलैलका।
तब ब्रह्मदेव ब्रह्मदेव के बोलैलका।
ब्रह्मदेव प्रकटल आवी केॅ कमल वन
इन्द्रदेव तब व्यथा अपनोॅ सुनैलका।
ब्रह्मदेव के कृपा से मुक्त भेल इन्द्रदेव
योनी के रोॅ शाप के नयन करि देलका॥122॥

गौतम के ऊपर तनल तरजनी जब
नाहक के लांछना अहिल्या पे लगाय छै।
नारी के समाज कहै पुरूष के कोन दोष
पुरूष स्वतंत्र छिक दस ठाम जाय छै।
छूतें परपुरूष के नारी अपवित्र भेल
स्वान के रोॅ जूठ कौने आदर से खाय छै?
गौतम के चाही कि अहिल्या के ऊ त्याग करेॅ
एहनोॅ दबाब सब मिली केॅ बनाय छै॥123॥

समरथवान इन्द्र, इन्द्र के न दोष गिनोॅ
कतनोॅ पतित सुरपतिये कहावै छै।
कोनो विधि भेल यदि नारी के सतित्व भंग
लौकिक चलन में ऊ पतित कहावै छै।
जगत में नारी सन दोसर निठुर कौन
नारी के रोॅ दुख नारी ही न पतियावै छै।
नजर से देखलक सब दोष इन्द्र के रोॅ
गौतम के नारी के कुलछनी बतावै छै॥124॥

सामाजिक कुरित में फँसल गौतम ऋषि
आब कोनो हाल भी न जानै लेली आवै छै।
परम हितैसी रहै जौने ऋषि गौतम के
उहो आवि जखम पे मिरची लगावै छै।
रसता चलैत नारी देखै जब गौतम के
ठोर पट-पट करि मूँह चमकावै छै।
बैठली गौतम निमझान भेल कुटिया पे
कोन काज करौ कुछ समझ न आवै छै॥125॥

आश्रम निवासी कुछ अहिल्या के दोष बाँचै
कुछ लोग इन्द्र के रोॅ आदत बतैलकै।
कुछ लोग कहलक, इन्द्र समरथवान
सब कुछ इन्द्र समरथ बस कैलकै।
कुछ कहलक, इन्द्रदेव से लड़त कौने
अपना के इन्द्र के हितैषाी बतलैलकै।
किनकरो दोष रहें अहिल्या पतित भेली
आश्रम निवासी एक मत से सुनैलकै॥126॥

सोरठा -

धिक-धिक मूढ़ समाज, दोष न मानै इन्द्र के।
बनल कोढ़ में खाज, सुरपति अपराधी बनल॥16॥

आश्रम निवासी बैठ अनुमान बॉचै, कहै
इन्द्र पे लोभैलोॅ होतै तब एन्होॅ घटलै।
मन में बसल होतै अमरावती के सुख
कुछ बतियैने होतै तब एन्होॅ घटलै।
अंग के रोॅ भंगिमा बनैने होतै मोहक, या
केन्हूॅ ललचैने होतै, तब एन्होॅ घटलै।
सब गुण से निपुण देवराज इन्द्र छिक
जरूर बोलैने होतै तब एन्होॅ घटलै॥127॥

व्यथित अहिल्या देवी पत्थर समान भेली
द्वार दिश एकटक बैठल हियाय छै।
कुछ भी न बोलै, न उठी केॅ कोनो काज करै
कानैत शिशु के भी न गोदी केॅ उठाय छै।
कखनी सुबह भेल, कखनी ढलल शाम
धूप-छाँह-हीम-ताप कुछ न बुझाय छै।
शरम से सिल्ल भेली व्यथित अहिल्या देवी
दोसर के दुख न दोसर पतियाय छै॥128॥

कानैत कानैत शिशु गोदी में चहरि गेल
अपने जत करि केॅ छाती से लगलै।
परल अहिल्या देवी रहली पषाणवत
कहीं समवेदना न तनियोॅ-टा जगलै।
अहिल्या के दशा देखि गौतम व्यथित भेल
ऋषि के रॉे नयन सहजेॅ झड़े लगलै।
आश्रम निवासी जे अकारण बेरूख भेल
एक सामाजिक डर मन बीच जगलै॥129॥

आश्रम के सेविका साध्वी सदानीरा छेली
शिशु के रोॅ सेवा में दायित्व सिर धैलकी
बेचारी अहिल्या भेली हाराख-बिसाद शुन्य
एक वेर पूत्र दिश सिर न घुमलैकी।
पकरी उठावै उठै, धरि केॅ सुतावै सूतै
अपने से एक वेर जतन न कैलकी।
नित नहलावै ऋषि, मुहँ केॅ खिलावै अरू
ठोकी केॅ सुतावै एन्होॅ सिल्ल रूप धैलकी॥130॥