भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 16 / विजेता मुद्‍गलपुरी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

लंका के बसैनें रहै हेती-परहेती दैत्य
देवासुर युद्ध में पाताल सब भागलै।
लंका के मनोरम परम सुनसान देखि
यक्षपति वहाँ पे कुवेर रहेॅ लागलै।
बाहुबली रावण कुवेर के रोॅ यश सुनि
लंका हरपै के उतजोग करेॅ लागलै।
दशानन रावण के योजना सफल भेल
आक्रमण करते ही यक्ष सिनी भागलै॥15॥

दोहा -

दुनियाँ पर भारी परल लंका के रोॅ नाम।
उदित अरूण जकतें करै, सब टा देशप्रणाम॥25॥

जब भेल रावण के राजधानी लंकापुरी
सब राजा पर धौंस अपनोॅ जमैलकै।
आरो तीनो लोक में मचल हरकंप तब
धनपति से ऊ पुस्पक छिनी लैलकै।
दुनियाँ के बाहुबल अपनोॅ दिखावै लेली
कैलाश पर्वत छन में उठावी लेलकै।
निन्द से जगल जब कभी कुंभकरण तेॅ
दशो दिश में ऊ हरकंप करी देलकै॥152॥

सेना-सुख-संपत-प्रताप-बल-बुद्धि-यश
दिन दूना लोभ रात चारगुणा बढ़लै।
मेघनाद सन वलशाली पुत्र जब भेल
वल के रोॅ मद तब माथ पर चढ़लै।
दुरमुख-धूमकेतु-अकम्पन-अतिकाय
एकरा निहारी वल आर वेसी बढ़लै।
कुल परिवार सब देखि क अपार वल
सब के विचार अनाचार दिश बढलै॥153॥

वल के बिलोकी तब रावण कहलकै कि
जगत में महाबली निशिचर जाति छै।
निशचर के रोॅ सब काज में खलल डालै
देवता समाज सब बड़ उतपाती छै।
मानव के यज्ञ के रोॅ आश पे पलनिहार
विसनु भी असुर समाज लेली घाती छै।
जखनी दहारै कभी मेघ जकाँ मेघनाद
इरसा से जरी उठै इन्द्र के रोॅ छाती छै॥154॥

देवता के वल छिन एक ही विधि से होत
जब कि न यज्ञ भाग देवता के मिलतै।
यज्ञ भाग बिन सब देव दुरवल होत
निशिचर जाति में सहजें आवी मिलतै।
सब निशचर जाति यज्ञ के विरोधी बनोॅ
यज्ञ के मिंघारोॅ जहाँ कहीं यज्ञ मिलतै।
हम छी रावण हम जगत विजेता छिकौं
हमरा आदेश बिना पात भी न हिलतै॥155॥

लेॅ केॅ चन्द्रहास आरू मेघनाद साथ लेॅ केॅ
रावण चलल तीनो लोक के हरावै लेॅ।
जोने जोग-जप करै, जहाँ कोनो तप करै
चलल निशाचर ऊ सब के डरावै लेॅ।
कुवेर-वरूण-वायु-चन्द्रमा-अनल-यम
यलल रावण दास सब क बनावै लेॅ।
देवता-मनुष्य-सिद्ध-किन्नर-गंधर्व-नाग
पकड़ि-पकड़ि अरदास करवावै लेॅ॥156॥

देव-यक्ष-मनुष्य-गंधर्व आरू नागकन्याँ
जबरन व्याही क रावण घर लैलकै।
सब राजा के रोॅ शिरोमणी भेल दशानन
भुजवल के प्रताप सब के देखैलकै।
सब निशिचर भेल वेद के विरूद्ध अब
खोजि-खोजि सब यज्ञ-थल के मिटैलकै।
सब में निशाचर के गुण विद्यमान भेल
धरती बेचारी लोर आपनोॅ बहैलकै॥157॥

सोरठा -

त्रसित भेल सब संत, बेचारी धरती बनल।
रावण के रोॅ अंत, होतै ऐता राम जब॥7॥