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अंगिका रामायण / दोसर सर्ग / भाग 1 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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गोरी के सवारी सिंह, शिव के सवारी बैल
दोनों एक ठाम जहाँ रहै तहाँ शिव छै।
कार्तिक के मोर आरो शिव के गलाके हार
दोनों संग-संग जहाँ बसै तहाँ शिव छै।
शिव के भुजंग आरो गणपति के मूसक
संग-संग विचरण करै तहाँ शिव छै।
भनत विजेता सिंह-बैल-मोर-मूस-साँप
संग-संग जहाँ निरवहै तहाँ श्वि छै॥1॥

फेरो से प्रणाम करौ ब्रात्य स्वामी शिव के रोॅ
जोने कि चौदह-ज्योति-लिंग निरमैलकै।
इहेॅ ब्रात्य धरम के एक-टा दोसर शाखा
लंकापति जौने रक्ष-धरम चलैलकै।
निरगुण ब्रात्य सिनी जोग के जुगति वाँचै
सगुनी स प्रेम शिवलिंग अपनैलकै।
भनत विजेता पूजोॅ ब्रात्य के रोॅ भूमि अंग
जहाँ पर अखण्ड समाधि शिव धैलकै॥2॥

सीता के स्वरूप पीत, नील वर्ण रामचन्द्र
हरियर मन-चित्त आनन्द उदित छै।
जेना पीत पारवती नीलकंठ महादेव
हरा-हरा ध्वनि सुनि चित्त हरखित छै।
नील रंग किसन के पीत रंग राधारानी
प्रेम के रोॅ परिणाम जगत विदित छै।
जेना पीत वसुन्धरा, आसमान नील रंग
बीच के वनस्पति सब-टा हरित छै॥3॥

भावना के वेग जब हिय में हिलोर मारै
तखने लगै छै जनु शारदा सहाय छै।
भाव के रोॅ शब्द तब शब्द-शब्द गुथी-गुथी
अपने उतरि क कवित्त बनि जाय छै।
उतरै छै शब्द जब अनुपम अर्थ लेॅ केॅ
ऐलोॅ होलोॅ शब्द के सहेजी क राखै के लेली
मद्गलपुरी तब कवि कहलाय छै॥4॥

साहित्य जगत के रोॅ कवि प्रजापति छिक
एकरा जे जानतै से ब्रह्म के समझतै।
जीव के रोॅ अंदर के प्राण तत्व ब्रह्म छिक
गूढ़ पहचानतै से ब्रह्म के समझतै।
प्राणतत्व के रोॅ अभिव्यक्ति छिक पंचतत्व
एकरा जे मानतै ऊ ब्रह्म के समझतै।
पंचतत्व के रोॅ कुल योग छिक प्राणतत्व
जौने-जौने जानतै ऊ ब्रह्म के समझतै॥5॥

दोहा -

बंदौ ब्रह्म स्वरूप कवि, जे सिरजै साहित्य।
बतलावै हर काल में, जीवन के औचित्य॥1॥

सोरठा -

बाढ़य ज्ञान अपार, अहंकार सँग-सँग बढ़ै।
उपजै रूढ़ विचार, हिय उपजै तारक असुर॥॥।

तारक असुर अजेय, ब्रह्मदेव से पाय वर।
सब जन के दुख देय, हारल विष्णु-विरंचि-शिव॥2॥

तारक असुर से पिड़ित सब देव गण
इन्द्रदेव पास आवी दुखड़ा सुनैलकै।
देवराज इन्द्र सब देवता के संग लेने
सत्य लोक आबी सब देव के बतैलकै।
इन्द्र के रोॅ वज्र झुठ, वरूण के पाश झूठ
कुवेर के गदा निसफल बतलैलकै।
यम के रोॅ दण्ड झूठ, आदित्य के तेज झूठ
मरूत के वेग सब विफल बतैलकै॥6॥

रोला -

जय-जय-जय हे जगत पिता हे जग निरमाता।
प्रकृति पुरूष सम रूप, विरंचि जगत पितु माता॥1॥

जगत सृष्टि के वीज तत्व तों जग के कारक।
नारी पुरूष दू रूप एक अंग केर धारक॥2॥

सत-तम-रज गुण तीन, एक ब्रह्मा कहलाबै।
तोर जगल जग सृजन, सयन संहार कहावै॥3॥

तों जग पालनिहार, जगत तोरोॅ सश गावै।
तोर पसारल खेल सकल संसार कहावै॥4॥

सासगर सन गंभीर, तुहेॅ चंल चित जैसन।
पर्वत जकाँ कठोर, गुलायम माँखन जैसन॥5॥

हलका रूई जकाँ, भार शीतल हिम जैसन।
जगत जकाँ असथूल, सुक्ष्म विद्या के जैसन

आदि पुरूष तों एक, अनादि ब्रह्म कहलावै।
जगत नियंता तोर नियामक समझ न आंवै॥7॥

हे जग सिरजनहार ब्रह्म तोरोॅ यश गावौ।
तजि के सकल बिभेद तोर नित चरण मनावौ॥8॥

जग के पालनहार, जगत रक्षक सुखदायी।
तों विद्या के तेज, कहाँ तक करौं बरायी॥9॥

काल स्वभाव करम सब के तोहें संयोजक।
हानि-लाभ, दुख-सुख, जड़-चेतन सब के योजक॥10॥

तोहें जग के नाभि-धूरि-चक्का-गति तोहें।
तोहें स्रोत-तरंग-भंवर-धारा-यति तोहें॥11॥

सकल चराचर तोंहि, सिद्ध तोरोॅ यश गावै।
तों जग के आधार, सुमरि जग मुकती पावै॥12॥

जनम मरन से रहित, अजनमा तों अविनाशी।
अन-जल-औषध और वनस्पति सब थल वासी॥13।

सूरज से भी दिव्य तेज जानै सब ज्ञानी।
तोरोॅ महिमा जानि, परम पद पावै प्राणी॥14॥

अणु से भी तों अणु, विशाल से भी विशालतम्।
तों निशछल असथिर असथावर सन महानतम्॥15॥

रूप रहित, सब दोष रहित तों सब जग व्यापी।
सुमरै तोरोॅ नाम, तरै भवसागर पापी॥26॥

तोर कृपा तोरा गावी जग तोरा पावै।
तोर कृपा पावी मुद्गल कवि संत कहावै॥17॥

तोरे लीला अलख ब्रह्म हय जगत पसारल।
कर-पद से तों रहित, परन्तु सृष्टि विस्तारल॥18॥

वेद मंत्र में, यज्ञ वरत में, तोरोॅ गाथा।
परम पिता परमेश्वर कहि जग नावै माथा॥19॥

सकल पसारल तोर, तोहि प्रकृति के स्वामी।
शक्तिमान तों पूजनीय तों अंतरयामी॥20॥

तोर कृपा से सदा संत शान्ति के पावै।
तों उद्भव करता यश तोरोॅ शंकर गावै॥21॥

सब के हिय में वास करी नव विश्व रचावै।
ध्यान बिना तोरोॅ महत्व जग समझि न पावै॥22॥

पृथक नाम गुण जीव रची तों जग उपजैलेॅ।
पृथक नाम गुण लोकपाल-दिगपाल बनैलेॅ॥23॥

पृथक-पृथक तोंदेव-मनुज-खग-नाग बनैलेॅ।
सब से ऊपर एक सुरूज के रचना कैलेॅ॥24॥

तों ईश्वर के भी ईश्वर, पर ब्रह्म कहावोॅ।
हे रक्षक के रक्षक ब्रह्मा जगत बचावोॅ॥25॥

तों उद्ीाव करता जग के कारण के ज्ञाता।
तों स्रष्टा-द्रष्टा जग के तों सृजक विधाता॥26॥

निर्विकार निर्लेप निगुन निर्मल मन तोहें।
जग के सिरजनहार, सृष्टि के कण-का तोहें॥27॥

जगत सृजन के हाल, लेखिनी वरनि न पावै।
महिमा अपरमपार, शेष शारद यश गावै॥28॥

अष्ट सिद्धि, नव निधि तोहर इच्छा पर नाचै।
तोहर किरती देवऋषि घुमि-घुमि केॅ वाँचै॥29॥

तों यग करता, अरपन और हवन भी तोहें।
तों समिधा जल-अरग, क्रिया अरू यग-फल तोहें॥30॥

कर में चारो वेद, कमंडल गंग सुहावै।
निस-वासर सब देव, अहाँ के अस्तुति गावै॥31॥

हाथ जोरि हम कहौं नाथ एक जुगति विचारोॅ।
वर उतपाती भेल, असुर तारक संघारोॅ॥32॥

दोहा -

निसिचर अमरावति बसै, दर-दर भटकै देव।
देवराज भागल फिरै, कहाँ शरण हम लेव॥2॥

देवगुरू वृहस्पति हाथ जोड़ि कहलन
नाथ सब देवता के संकट में जान छै।
तोरा से ही बल पावी बनल उदण्ड अब
तारक असुर धुमकेतु के समान छै।
जेकरा कि सेवा हेतु चन्द्रमा बिखेरै कला
सुरूज के छीन लेने जौने मुसकान छै।
जेकरा कि बाग में वसन्त बसै माली जकाँ
उनचासो मरूत के साँसत में प्राण छै॥7॥

देवराज इन्द्र अपने भी राखै दास भाव
देववधु असुर के चँवर डुलाय छै।
यजमान द्वारा यज्ञ के रोॅ देवता के भाग
अगिनी से छिनी तारका असुर खाय छै।
इन्द्र के रोॅ उच्चेश्रवा घोड़ा भी छिनी लेलक
एरावत पर अधिकार ऊ जमाय छै।
विष्णु के सुदरसन जहाँ निसफल भेल
देवता के कोनो जुगतिये न बुझाय छै॥8॥

हे जगत पिता, हे जगत सिरजनहार
तारका के त्रास से निदान होना चाहियोॅ।
धुमकेतु के समान उदित असुर भेल
एकरोॅ केनाहुँ अवसान होना चाहियोॅ।
जगत रचनिहार रचोॅ एक सेनापति
नव देव-सेना रिमान होना चाहियोॅ।
धरम अधरम के मिटल फरक सब
सत्य के अलग पहचान होना चाहियोॅ॥9॥

देवगुरू के रोॅ बात सुनलक ब्रह्मदेव
तब हुन्हीं देवता के जुगति बतैलकै।
शिव के रोॅ अंश उतपन्न होत धीर-वीर
बलवान कार्तिक कुमार बतलैलकै।
उनका ही हाथ से मरत तारका असुर
एकमात्र इहेॅ टा निदान बतलैलकै।
आनन्द स्वरूप एक शिव केरोॅ ध्यान करो
ब्रह्मदेव शिव के महातम सुनैलकै॥10॥