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अंजलि / शिव कुमार झा 'टिल्लू'

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कक्का: सूति रहू अय बुच्ची ओल,
पाकल परोर सन लागय लोल
उल्लू मुख भदैया खिखिरक वोल,
नाम ‘अंजलि’ कतेक अनमोल

अंजलि: माय , कक्का वड़का शैतान,
थापर मारि ठोकै छथि कान
अहाँ सँ नुका कऽ चिववथि पान,
फोड़वनि माथ वा तोड़वनि टॉग

कक्का: भौजी !छोटकी फूसि वजै छथि,
रीतू संग भरि दिन विन-विन करै छथि
दावि रहल छी हिनक देह हम,
उत्छृंखल नेना करै छथि तम-तम

अंजलि: कक्का जुनि घोरू मिथ्याक भंग,
आव नहि सूतव हम अहाँक संग
माँ लग हमरा सँ सिनेह देखवैत छी,
एकात पावि हमर घेंटी दवैत छी

कक्का: पठा देव काल्हि अहाँ केॅ हॉस्टल
नेनपन ओहि ठॉ भऽ जएत शीतल
ओतय भेटत नहि खीरक थारी,
नहि रसमलाइ नहि पनीरक तरकारी

अंजलि: काकू बनव हम बुधियारि नेना,
सदिखन वाजव सुमधुर वयना
ककरो संग नहि मुॅह लगाएव,
अहीं लग रहव हाँस्टल नहि जाएव