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अंत की शुरुआत / बाजार में स्त्री / वीरेंद्र गोयल

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रक्त, लौटेगा रक्त में
हड्डियाँ, हड्डियों में
मज्जा, मज्जा में
वायु, वायु में
अग्नि, अग्नि में
प्राण, प्राण में
मिट्टी होगी खाक
स्तनपायी ही बदल पाते हैं
रक्त को दूध में
कहाँ किया ऐसा
स्मृतियाँ लौटेंगी, स्मृतियों में
जुड़ेगा एक और क्षण
आकर लेगी यात्रा
भविष्य में अतीत की
जिधर से भरा जायेगा
खाली होगा उधर ही
कहाँ खोला कोई रंध्र
कि निकल जाते उस पार
जैसे आये थे नग्न
पड़े हो वैसे ही
जाने के लिए
लिखे जा चुके
कितने ही भविष्य
अतीत के तहखाने में
खुलेगा, जो सबसे ऊपर है
खुलेगा, जो सबसे शक्तिशाली है
एक और जीवन
विचारों के गर्भ में
हर बार अपना खेल
खुद ही चुनते हो
किसका है दोष
दर्ज होती रहती हैं इच्छाएँ
तुमने भी तो ऐसा ही किया
जानते हुए भी सत्य
जीवन अपनी मर्जी से जिया
करते रहे यात्राएँ
बनवाते रहे पारपत्र
दूर निकल गये
सोचते-सोचते
लौटकर न आने के लिए
अगले जीवन को
अपनी मर्जी से जिये जाने के लिए
त्यागकर ये जीर्ण-शीर्ण वस्त्र
अंत कर दिया शुरुआत के लिए!