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अंदोह-ओ-ग़म की बात तिरे बाज बन गई / वली दक्कनी

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अंदोह-ओ-ग़म की बात तिरे बाज बन गई
आवाज़ मेरी आह की फिर ता गगन गई

ताहश्र उसका होश में आना मुहाल है
जिसकी तरफ़ सनम की निगाह-ए-नयन गई

सुरमे का मुँह सियाह किया उसने जग मिनीं
जिसकी नयन में पीव की ख़ाक-ए-चरन गई

तनहा सवाद-ए-हिंद में शुहरत नहीं सनम
तुझ ज़ुल्‍फ़ मुश्‍कबू की ख़बर ता ख़ुतन गई

अब लग 'वली' पिया ने दिखाया नहीं दरस
ज्‍यूँ शम्‍मे-इंतिज़ार में सारी रयन गई