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अंधकूपों का अँधेरा रोशनाई हो गया है / प्रेम भारद्वाज

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अंधकूपों सा अँधेरा रौशनाई हो गया है
राहज़न का राज़ लिखना ही बुराई हो गयाहै

कुछ लकीरों के फक़ीरों की यहाँ इतनी चली है
राह अपनी ख़ुद बनाना बेवफाई हो गया है

कामना की दौड़ में फिरसत किसे समझे ज़रा भी
यातना उस पेड़ की जो बोनसाई हो गया है

गलकटों चोंरों लुटेरों जाबिरों के कारनामों
का बदल कर नाम हाथों की सफाई हो गया है

इस हवा में साँस लेना था कहाँ आसान अब तो
फेफड़ों के ज़ोर की भी आजमाई हो गया है

कब करिंदों की सफाई का चले अभियान देखें
डॉन का तो काम सारा बासफाई हो गया है

प्रेम रस मुजरे दलाली हैं वही बस नाम केवल
देवदासी से बदलकर आजा बाई हो गया है