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अंधा राही अंधी राहें होनी का जल उठा दिया / प्रमिल चन्द्र सरीन 'अंजान'

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अंधा राही अंधी राहें होनी का जल उठा दिया
दिल के आंखें उग आईं हैं मैंने सब कुछ देख लिया

ज़ख्मों को मैं पाल रहा था ठीक वो कैसे हो जाते
चारागरों ने ज़ोर लगाया कुछ न दवा ने काम किया

उड़ते पंछी के पर गिनना कुछ इतना आसान न था
मैंने वो भी करके दिखाया मुश्किल को आसान किया

जैसे भी हो मैंने यारो उसकी राहें रौशन कर दीं
चाहे अपने दिल को जलाया चाहे घर को फूंक दिया

मेरी इमदादों का लेखा उसको बिल्कुल याद नहीं
मंज़िल पर जब वो जा पहुंचा भूल गया सब लिया दिया

नारायण भी बच नहीं पाए नेकी करके नारद से
राम जी बन के बन भटके बोल रहे थे सिया सिया

इक तू है जो तूने मुझ पर क़दम पर सितम किये
और इक मैं हूँ मैंने हंसकर तेरी जफ़ा का ज़हर पिया।