भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अक़ल का कब्ज़ा हटाया जा रहा है / विनय कुमार

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अक़ल का कब्ज़ा हटाया जा रहा है।

जिस्म का जादू जगाया जा रहा है।

लाख पी लो प्यास बुझती ही नहीं है क्या पता क्या-क्या पिलाया जा रहा है।

हर तरफ डाकू बसाए जा रहे हैं वक़्त को बीहड़ बनाया जा रहा है।

हद ज़रूरत की उफ़क़ छूने लगी है क़द ज़रूरत का बढ़ाया जा रहा है।

सोचने से मुल्क बूढ़ा हो गया है सोच से पीछा छुड़ाया जा रहा है।

सख्तजां हैं ये हरे फल हरे पत्ते पेड़ को नाहक हिलाया जा रहा है।

नींद धरती की उड़ाई जा रही है चांद को सोना सिखाया जा रहा है।

साजिशें मुझको गिराने की कहीं हैं क्यों मुझे इतना उठाया जा रहा है।