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अकाल में क्रान्ति / कुमार सौरभ

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रोते चूल्हे को
ढाँढ़स बँधाती कानी कुतिया
वहीं सो गयी है ।
चक्की की उदासी
बढ़ती जा रही है..

देखो तो- बाबा नागार्जुन
दाढ़ी सहलाते
गुनते मार्क्स को
कवित्त बना रहे हैं
या महीने भर की रासन की लिस्ट ?

अकाल में दूब भी जल जाती है साहब
हम आदमी हैं
माचिस क्या खोजते हो
अपने तो पेट में आग है
बस थोड़ा गेहूँ चाहिए
जो सड़ रहा है जगता सेठ के गोदाम में
मुखिया जी की हवेली
सरपंच के मकान में
जब बीबी बच्चे बिलबिला रहे हों भूख से
तो क्या पाप क्या पुण्य

..रे उट्ठ..आज चुल्हा जलेगा !!

चक्की घिस्स
चूल्हा खुश्श
कुतिया फुर्र
होठों पे मुस्की बाबा चुप्प ।

शब्दार्थ