भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

अकेला नहीं हूँ / महेन्द्र भटनागर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अकेला नहीं हूँ,
अकेला नहीं हूँ,
ज़माना नया साथ है,
और मैं भी बड़ी ही खुशी से सदा साथ उसके !

करोड़ों भुजाएँ मुझे आज बल दे रही हैं,
अथक शक्ति मेरी बिना रोक के ले रही हैं !
अनेकों क़दम गिर्द मेरे निरंतर चले जा रहे हैं,
बढ़े जा रहे हैं !

निराशा नहीं है,
निराशा नहीं है,

किसी भी तरह की विवशता नहीं है !
रुकावट ठहरती न जन-धार के सामने सब उखड़ती चली जा रही हैं !

कि पिघला बरफ़ किस हिमालय-शिखर का ?
नयी भूमि को जो बनाये चला जा रहा है,
निडर शान्त बस्ती बसाये चला जा रहा है !
हरा,
लाल,
पीला,
गुलाबी चमन आज उसी ने खिलाया,
मनुज को मनुजता बतायी,
दबे चेहरे की / गिरे चेहरे की चमक भी बढ़ायी !
उसी ज़िन्दगी से मिलाओ चरण !
और हँस-हँस उसी ज़िन्दगी से लड़ाओ नयन !